स्वाहा 1

हवाएं चींख रही थीं Antarvasna मूसलाधार बारिश kamukta जारी थी । आकाश से धरती तक मानो पानी की चादर सी तन गई थी। रात के दौ बजे थे ।
भयानक अन्धेरी रात. ..गरजतै बादल… कडकडाती बिजली… .बारिश के शोर और दरवाजे खिड़कियां बजाती हवा ने वातावरण को जैसे प्रेत–ग्रस्त बना रखा था।

ऐसै में उसने वह ख्वाब फिर देख लिया था ।

बडा ही अजीब ख्वाब था । भयावह, खौफजदा और सहमा देने वाला और इस ख्वाब को वह अब निरन्तर देखने लगी थी। हर दूसरी तीसरी रात वही ख्वाब देखती भी वह । आज भी जव उसकी आंख खुली तो उसके शरोर में कम्पन था। वह होले होले कांप रही थी ।

दिल बैठा जा रहा था । कंठ में कांटे से पड़ रहे थे । दिमाग जैसे ठस्स होकर रह गया था ।

पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि उसकी आंख खुल गई हैं या यह अभी तक ख्वाब देख रही है।

वह अभी एक घंटा पहले ही तो सोई थी । आज शाम से उसकी तबियत ठीक न थी । दिल पर कुछ बोझ सा था ।

आज उससे ठीक तरह से खाना भी नहीं खाया गया था। खाना खाने के बाद वह चहलकदमी के लिए जरुर निकलती थी । आज़ वह टहलने भी नहीं निकली थी I वस आधा अधूरा खाना खाकर ही अपने कमरे में आ गई थी ।

फिर कुछ देर वह टी वी के विभिन्न चैनल घुमाती रही ।

एक चेनल पर इंगलिश फित्म आ रही था l वह देखने बैठ गई। फिल्म लगभग बारह बजे खत्म हुई । उसने टी वी आँफ कर दिया । फिल्म सस्पैन्स बाली थी ।

उसके कई सीन बार बार उसकी निगाहों में घूम रहे थे । वह यूं ही कमरे से निकलकर गैलरी में आ गई और बाहर का नजारा करने लगी।

तभी निकट के एक पेड से एक परिन्दा उडा व तेजी से उसके सिर के पास से गुजर गया ।

वह एकदम सहम गई । वह काफी बड़ा पक्षी था-चील जितना वडा होगा ।

उसकी समझ में न आया कि रात के बारह बजे आखिर उसको उडने की जरूरत क्यों पेश आई।

यही लगा था उसे जैसे वह परिन्दा उसे ही गैलरी मै देखकर उसकी तरफ लपका था ।

इस ख्याल ने उसे सहमा दिया। वह फौरन कमरे में आ गई।

दरबाजा अच्छी तरह से वन्द किया और बिस्तर पर लेट गई ।

नींद आंखों से कोसों दूर थी ।

एक तो रहस्यपूर्ण, सस्पैन्स फिल्म का असर, फिर उस पक्षी का बहुत ही पास से चेहरे को हवा देते हुए गुजर जाना।

उसने सोचा कि वह नीचे जाकर सो जाए या फिर नीचे से किसी को अपने पास वुला ले। लेकिन ये दोंनो ही ख्याल खुद उसे उचित्त न लगे।
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