स्वाहा 6

रेखा ने फोरन बह लिफाफा antarvasna उठाकर बैग में kamukta डाल दिया और उसकी जिप बद’ करते हुए दरवाजे पर रखै पिन्जरे को देखने लगी । वह उल्लू अपनी वडी-बड्री जर्द आखों से उसे ही घूर रहा था।

“माया तुमने इस पिन्जरे को क्यों ले लिया? कौन था वह शख्स?” रेखा क्री परशानी बडती ही जा रही थी ।

”बीबी उस आदमी ने ज्यादा बात ही नहीं की । मैंने जैसे ही गेट खोला उसने यह पिन्जरा मेरी तरफ बढा दिया और बोला कि शीना को दे दें । ” मैने कहा कि कौन शीना-यहां इस नाम का कोई नहीँ है, तौ वह बोला कि अपनी रेखा बीबी को जाकर दे दें, –अच्छा में चलता हूँ- और यह कहकर उसने पिन्जरा मेरे हाथों में थमा दिया और मेरे कुछ कहने से पहले ही चला गया।” माया ने बताया। “शीना…ऽऽऽऽ!” रेखा को चक्कर-सा आगया। उसने खुद कौ सम्भाला, कैसा शख्स था वह! ! तुमने वडी गलती की माया । मुझे फौरन बुला लेना था।”

“उसने मेरी बात सुनी ही नहीं।” माया मुह बनाते बोली…”ओर वह बड़ा ही आजीब सा आदमी था, बीबी । काले कपडे पहने हुए था, बडे लम्बे-लम्बे बाल थे, जो उसके कंधों पर पडे हुए थे। साबले रग का था । लम्बा चेहरा, कानों में बालियां, एक हाथ में ताबे का मोटा सा कडा और उगली मै चादी’ की पत्थर लंगी अगूठी । काली चमकती हुई आखँ’, बस मै और क्या बताऊं बीबी, कि तो कैसा आदमी था। मैने तो इस तरह का आदमी पहले कभी नहीं देखा I फिल्मों में वो भूत-प्रेत उतारने वाले खौफनाक शख्य दिखते हैँ ना बीबी । वह बस वैसा ही था। ” रेखा फोरन खिडकी की तरफ गई I इस खिडकी से घर का गेट साफ नजर आता था। खिडकी. खौलकर उसने इधर-उधर देखा। मगर उसे कोई आदमी दिखाई नहीं दिया। उसने खिडकी बन्द की व पलटर माया से सम्बोधित हुई– ‘तुम्हें विश्वास है कि उस शख्स ने मेरा ही नाम लिया था?

”जी बिल्कुल, बीबी । पहले तो उसने शीना कहा, फिर जब मैने इन्कार किया तो बोला कि जाकर अपनी रेखा बीबी को दे दो। उसने साफ साफ आपका नाम लिया था बीबी। क्या आप उसे नहीं जानती?” माया ने हैरान हौकर पूछा ।

“नहीं माया! जाने कौन था वह शख्स। और वह देकर भी क्या गया है… I. ” रेखा की निगाहे फिर पिन्जरे की तरफ उठ गई । “हां , देखौ भला। यह भी कोई देने की चीज है….।”

‘ ‘भाई है क्या घर में?” रेखा ने अमर के बारे में पूछा ।

‘ ‘नहीँ बीबी! वह एक धन्टा पहले कहीं गया है।”

“और मौसी?”

“वह अपने कमरे में है। पाठ पढ़ रही हैं । ”

‘ ‘अच्छा तुम इस पिन्जरे को लेकर नीचे चलो-मैं आती हूँ । ”

“ठीक है, बीबी ।”

और माया नै जेसे ही पिन्जरे का कुण्डा पकडने के लिये हाथ बढ़ाया उल्लू ने बैचेन होकर फौरन अपने पंख फडफडाए __ और एक भयानक चीख मारी l माया ने घबराकर अपना हाथ पीछे खींच लिया।

“माया इसे फोरन नीचे ले जाओ… ।” रेखा बदहवास सी बोली।

और माया ने जैसे ही फिर पिंजरा उठाना चाहा-उल्लू फोरन ही उसकी तरफ झपटा और जोर-जोर से अपने पख फडफडाए ।

पिन्जरा छोटा था ।

उसके पर पूरी तरह खुल नहीं रहे थे। लेकिन बन्दे को खौफन्जदा करने के लिए बहुत थे । माया ने डरकर एक बार फिर अपना हाथ खींच लिया था।

‘ ’अरे, माया क्या कर रही हो, पिंजरा उठा लो । ‘ ‘ रेखा ने सख्ती सै कहा।

माया ने फिर उसे उठाना चाहा तो उल्लू ने इस बार फिर भयानक चीख मारी और अपने पख फडफडाने लगा । माया हाफती कापती सी बोली–मै इस पिन्जरे को नहीं उठा सकती । मुझें डर लग रहा है… । ”

“अच्छा ठहरो-मै उठाकर देखती हूँ।” कहते हुए रेखा आगे बढी।

उसके आगे बडते ही वह उल्लू अपनी जगह स्थिर हो गया । रेखा ने हिम्मत करके पिन्जरे की तरफ हाथ बढाया । वह तैयार थी कि जेसे ही उल्लू चीखेगा, वह फोरन अपना हाथ खींच लेगी । लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। उल्लू अपनी जगह सिकुडा सिमटा व शांत बैठा रहा। रेखा ने दिल कड़ा करके पिजरा उठा लिया। उल्लू न फडफडाया न झपटा और न ही उसने खौफनाक आवाज निकालीं l

‘ ‘लौ माया, अब तुम नीचे ले जाओ इसे । ‘ ‘ कहते हुए रेखा ने पिन्जरा माया के हाथ में दे दिया ।

पिन्जरे का माया के हाथ में आना था कि उल्लू फोरन फडफडा उठा। साथ ही उसने एक भयानक चीख मारी-कुछ इस तरह कि माया ने पिन्जरा फौरन फर्श पर रख दिया और तेजी से सीढिया उतरती चली गई।

वह शायद बुरी तरह डर गई थी I

माया के जाने के बाद रेखा ने पिन्जरे पर एक नजर डाली । खौफनाक उल्लू खामोशी से बुत बना-रेखा को अपनी बडी-बडी और जर्द आखों’ से देख रहा था। उसकी आखों’ में न जाने क्या बात थी कि खौफ की एक लहर रेखा के बदन में उतरती चली गई। रेखा ने पिन्जरे को वहीँ छोडा व अपने कमरे में घुसकर दरवाजा बन्द कर लिया।

वह बैड पर आ बैठी और बैग से वह लिफाफा निकाला। लिफाफा हाथ में आते ही उसके दिल की धडकने सहसा ही तेज हो गई । हाथ में कम्पन आ गया । यहीँ सोच रही थी वह कि इस लिफाफे में जाने क्या बद’ है?

यह नो इच लंबा और चार इच चौडा… एक सफेद रग का लिफाफा था? रेखा ने उसे रोशनी कीं तरफ करके देखा तो उसमें एक पत्र के रखै होने का आभास हुआ । उसने हिम्मत करके लिफाफा फाड़ा व खत बाहर निकाल लिया । लेकिन यह एक ख़त्त तो क्दापि नहीं था । कागज पर कुछ लिखा हुआ नहीं था । इस पर पेन्सिल से एक स्केच बना हुआ था और यह वही रेखा चित्र था जिसे वह कई रातों से निरन्तर देख रही थी ।

एक गोल झोपडी । झोपडी पर बैठा हुआ उल्लू। दरवाजे पर कुण्डली मारे बैठा साप । झोंपडी के अन्दर अंधेरा । यहीँ तो वह दृश्य था जो उसे रव्वाब में नजर आता था।

बस एक आवाज की कमी थी । फिर एकाएक ही उसके दिमाग में वह’ आवाज भी गूजने लगी—डरो मत । अंदर आ जाओ ।”

यह कागज सफेद था और इस ख्वाब वाले नजारे के अलावा उस पर कुछ नहीं लिखा था। रेखा ने कागज पलटा देखा तो उस पर एक और रेखा चित्र दिखाई दिया । यह एक दरवाजा था-बन्द दरवाजा और दरवाजे के हैण्डल पर एक तवीज लटका हुआ था।

इस दरवाजे व इसके हेण्डल पर लटके हुए ताबीज को देखते ही रेखा के दिमाग में एक धमाका-सा हुआ और उसके मुह सै वेअख्तयार निकला—

“अरे यह तो नीचे वाले कमरे का दरवाजा है। ”

उसने जल्दी से उस कागज को वापस लिफाफे में डाला और दरवाजा खौलकर हवा के तेज झोंके की तरह बाहर निकली ।